
अजीत मिश्रा (खोजी)
जमीनी हकीकत से बेखबर भाजपा: क्या ‘ठेकेदारों’ का वर्चस्व फिर डुबोएगा चुनावी नैया?
- “लोकसभा-विधानसभा की हार के बाद भी संभल नहीं रही भाजपा, क्या ‘धनबल’ पर टिकी है भविष्य की जीत?”
- “हार के बाद भी नहीं जागा भाजपा का शीर्ष नेतृत्व, ठेकेदारों के कब्जे में संगठन”
- “बस्ती भाजपा में ‘ठेकेदारों’ का बोलबाला, उपेक्षित कार्यकर्ता फिर डाल सकते हैं वोट पर ताला”
- “क्या पैसे के दम पर भाजपा का टिकट पाएंगे ठेकेदार? कार्यकर्ता में गहरा असंतोष”
बस्ती: आगामी विधानसभा चुनावों की आहट के साथ ही बस्ती में भाजपा का राजनीतिक पारा चढ़ने लगा है। पार्टी मुख्यालय से लेकर ग्रामीण इलाकों तक कार्यक्रमों की झड़ी लगी है, लेकिन जमीनी स्तर पर पार्टी की स्थिति चिंताजनक बनी हुई है। लोकसभा और बीते विधानसभा चुनावों में मिली करारी हार के बाद भी सत्तारूढ़ दल की कार्यप्रणाली में कोई बड़ा बदलाव आता नहीं दिख रहा है। पार्टी के भीतर कार्यकर्ताओं की बढ़ती उपेक्षा और ‘ठेकेदारों’ का बढ़ता हस्तक्षेप एक बार फिर भाजपा के लिए ‘विभीषण’ साबित हो सकता है।
हार से सबक लेने में नाकाम भाजपा
बीते लोकसभा चुनाव और विधानसभा की पांच में से चार सीटों पर मिली हार ने भाजपा को आईना दिखाया था, लेकिन पार्टी नेतृत्व ने इस झटके से कोई ठोस सीख नहीं ली है। आज भी स्थिति यह है कि संगठन की मजबूती के बजाय कुछ रसूखदार नेता निजी एजेंडे और ‘ठेकेदारों’ की बिसात पर चलने को मजबूर दिख रहे हैं।
कार्यकर्ताओं की उपेक्षा और ठेकेदारों का ‘दबदबा’
पार्टी के पुराने और निष्ठावान कार्यकर्ताओं में गहरा असंतोष है। कार्यकर्ताओं का दर्द है कि “जब दरी बिछाने और पसीना बहाने का समय था, तब उन्हें याद किया जाता था, लेकिन अब सत्ता और टिकट के खेल में उन्हें हाशिए पर धकेल दिया गया है।”
रिपोर्ट के अनुसार, जिले का एक रसूखदार ठेकेदार अपने धनबल के सहारे ब्लॉक प्रमुखी से लेकर विधानसभा तक के टिकट पर दावेदारी ठोक रहा है। कार्यकर्ताओं का कहना है कि:
- पैसा बनाम निष्ठा: संगठन के खांटी कार्यकर्ता इन ‘धनबलियों’ को शून्य मान रहे हैं।
- आंतरिक खींचतान: पार्टी के भीतर गुटीय संघर्ष चरम पर है, जिसका सीधा लाभ विपक्ष को मिलने की पूरी आशंका है।
ग्राम पंचायत चुनाव: संशय के घेरे में भविष्य
आगामी विधानसभा चुनाव की तैयारियों के बीच स्थानीय निकाय चुनावों को लेकर भी अनिश्चितता बनी हुई है। ग्राम पंचायत, क्षेत्र पंचायत और ब्लॉक प्रमुख पदों का कार्यकाल जुलाई में समाप्त होने वाला है, लेकिन सरकार की ओर से अभी तक कोई स्पष्ट तैयारी नहीं दिख रही है। इस संशय के बीच भाजपा का सारा ध्यान केवल विधानसभा के ताने-बाने पर है, जबकि स्थानीय स्तर पर संगठन की पकड़ ढीली होती जा रही है।
विपक्ष की चाल और भाजपा की चुनौती
दूसरी ओर, सपा और बसपा अपने कार्यकर्ताओं को सक्रिय करने में जुटी हैं। भले ही उन्होंने अभी तक प्रत्याशियों की घोषणा न की हो, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके कार्यकर्ताओं को मिली तरजीह भाजपा के लिए खतरे की घंटी है।
निष्कर्ष: सुधार की दरकार
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यदि भाजपा को अपनी खोई हुई साख वापस लानी है, तो उसे ‘ठेकेदारों’ के जाल से बाहर निकलना होगा। कार्यकर्ताओं का सम्मान बहाल करना और धनबल के बजाय जनबल को प्राथमिकता देना ही पार्टी के लिए एकमात्र रास्ता बचा है। यदि समय रहते पार्टी नेतृत्व ने अपनी कार्यशैली में सुधार नहीं किया, तो आगामी विधानसभा चुनाव में पार्टी को फिर एक बार बड़े नुकसान का सामना करना पड़ सकता है।
क्या पार्टी नेतृत्व आगामी चुनावों में अपनी पुरानी गलतियों को सुधार पाएगा, या धनबल का वर्चस्व एक बार फिर भाजपा की नींव को कमजोर करेगा? यह सवाल बस्ती की राजनीति में हर कार्यकर्ता की जुबान पर है।

















